Friday, 14 February 2014

जल बिन मैं जल गई





जल बिन मैं जल गई,

एक जल से पीड़ा भई,

एक जल से निर्मल हुई,

 कृति रितेश मिश्रा 

Thursday, 2 May 2013

मजबूर हूँ इस लिए आज मैं मजदूर हूँ

                   
                                                 मजबूर हूँ इस लिए आज मैं मजदूर हूँ

                           आज इस दौर में हम 14 फरवरी के दिन Valentine Day के रूप में मानते है। और भी दिवस को बहुत उत्सह मानते है लेकिन क्या आप जानते है कि 1 मई को किस दिवस के रूप में मनाया जाता है शायद बहुत से लोगो को नहीं मालूम होगा मैं आप को बताने की चेष्टा करता हूँ। 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है क्या आपने कभी  1 मई को किसी एक मजदूर को  एक फूल दिया है, नहीं दिया होगा।
                                  हर वह व्यक्ति जो दिहाड़ी पर जीवन यापन करता है वह मजदूर की श्रेणी में आता है। मैं सबसे पहले आप सभी लोगो को समझाना चाहूँगा दिहाड़ी क्या है? दिहाड़ी का मतलब है "जब एक व्यक्ति कार्य पर जाता है तो उसके बदले उसे जो रूपए मिलते है। उन रूपये को उसकी एक दिन की  दिहाड़ी कहते है।" दिहाड़ी में जितने दिन काम करोगे आप उतने दिन के रुपये मिलते है।
                              मजदूर या मजदूरी सुनकर कुछ लोगो को यह लगता है कि यह बहुत निचले स्तर का काम है। उनको हीन भावना से देखते है शायद वह भूल जाते है कि मजदूर न हो तो वह जिस घर में रहते है  वह घर नहीं बन पाता। मजदूर अपना घर नहीं बना पता है लेकिन दुसरो के घर बनाता रहता है। हमारे आस पास की हर वस्तु से वह कही न कही वह जुड़ा रहता है। वह चाहे हमारे पैरों के नीचे की सड़क , शहरो में बड़ी-2 बिल्डिंग हो, गाँव से हमारे पास आने वाली खाने की वस्तुए, मजदूर के बिना मुमकिन नहीं।
                          मजदूर हमारे हर कामो से जुड़े होने पर भी, हमारा नजरिया उनके प्रति गलत है हम उनके प्रति सोचते नहीं है। जब हम मजदूर मंडी जाते है तो उनके भाव या दिहाड़ी सुनकर भौचके रह जाते है। लेकिन यह कभी नहीं सोचते है कि  एक मजदूर साल में औसतन 200 से 250 दिन ही मजदूरी कर पता है बाकि 100 से 150 दिन वह मजदूरी नहीं कर पाता है इसमें सबसे बड़ा कारण है काम का न मिलना।
                                      इस विषय पर मैंने कुछ मजदूरों से बात की मैंने उनसे यह पूछा साल में कितने दिन मजदूरी करते है मुन्ना ने जवाब दिया कि -बहुत ज्यादा 200 दिन, वही जफ़र ने कहा मैं आज एक माह बाद मंडी में आया हूँ तो मैंने पूछा क्यों तो जवाब आया कि मेरे काम करते समय सरिया मेरे पैर में लग गयी थी। ज्यादा चोट नहीं थी लेकिन भारी सामान नहीं उठा सकता था, एक दो दिन मैं मंडी आया लेकिन काम नहीं मिला फिर मैं गाँव वापस चला गया। मैंने पूछा काम क्यों नहीं मिला तो जवाब आया "लगडे घोड़े पर, पैसे कौन  लगाता है" तो मैंने उनसे  कहा गाँव है खेती क्यों नहीं करते है तो उन्होंने मुझे देखा और बोले बेटा अगर खेती से गुजारा हो जाता तो मैं यहाँ परिवार छोड़ कर क्यों आता।
              ऐसे कई मजदूर से मिला बात की सबकी आपनी-2 कहानी, अपनी-2 मजबूरी  है जो वह मजदूरी करते है। मेरा मकसद यह था बताना कि मजदूरों या मजदूरी शब्द को हीन भावना से न देखे क्योकि मजदूर नहीं होते तो हमारे बहुत से काम रुक जायेगे हमे घर की जगह खुले अस्मां में सोना पड़ेगा।

                                       "मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ,
                                                  तब भी मैं सकून मैं हूँ ,
                                        शहर के हर घर की ईट में मैं मौजूद हूँ।"
                               

Sunday, 28 April 2013

मैं मजदूर हूँ 


 मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ 
       तब भी मैं सकुन में हूँ            
शहर के हर घर की ईट में मैं मौजूद हूँ 
  क्या हुआ मेरा आशियाना है  नहीं 
दुसरो की आशियाना बनाने में सक्षम हूँ 

मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ 

गर्मी हो या सर्दी हो हर वक्त मैं मजूद हूँ 
दिहाड़ी ज्यदा हो या कम हो मुझमे सकून हूँ 
क्योकि मैं ईमानदारी व मेहनत की खाता हूँ 
 दुसरो के टुकड़ो पर जीने वाला नहीं हूँ 

मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ 

जाओ उस भगवान् से कह दो 
अगले जन्म में मुझे फिरसे मजदूर बनाना 
क्योकि मैं कोई चोर-कातिल नहीं हूँ 



 मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ 
     तब भी मैं सकूँ में हूँ क्योकि            
शहर के हर घर की ईट में मैं मौजूद हूँ 

                                                                       
                                                                                   Written by-Ritesh Mishra

Sunday, 14 April 2013

शायरी




परवाने को कौन समझाये,
शमां सिर्फ जलाती है।
यु तू हम खुद को भी न रोक पाये,
उस रह पर जाने से, 
जहां महबूब सिर्फ दिल जलती है।।

                                                   रचना- रितेश मिश्रा 

मैं दीवाना




मैं दीवाना मस्ताना तेरा नैनो का, 
तू फुलो की रानी, मैं राजा भौंरों का,


मैं मदहोश भौंरों तेरी जवानी का, 
आजा पास एक बार तू, क्या ठिकाना जिंदगी का ,


तू स्टेरिंग बनजा, मेरी जिंदगी का, 
तू जिधर मोड़ दे, मैं उधर को चल दू,

यह मन है दीवाने का। 

                                                         रचना- रितेश मिश्रा 

                 

Friday, 5 April 2013

दोहा

 

चलता माइक्रोवेव देख कर रितेश दिहिस रोये। 
इस चौखानटे डिब्बे में ठंडा बचा न कोये।।


                                                 Written By-रितेश मिश्रा (विश्वास)


Wednesday, 3 April 2013

आज तू मुझसे कितना दूर,मैं तुमसे कितना दूर ,



आज तू मुझसे कितना दूर,मैं तुमसे कितना दूर ,
इस दिल के अरमां , आज कितने है तुमसे दूर ,
न तुमने समझा , न मैंने समझा ,
न समझ पाया दिल 
ये अरमां  है, जो निकल रहे है अश्को से,
आज तू मुझसे कितना दूर,मैं तुमसे कितना दूर ,

मैंने हर रीति तुझसे निभाई , 
फिर भी हमारे बीच क्यों आई जुदाई ,
न तुमने समझा , न मैंने समझा ,
मेरे हर लब पर तेरा नाम है ,
मेरे हर अश्क पर तेरा नाम है ,
आज तू मुझसे कितना दूर,मैं तुमसे कितना दूर ,

                                                          रचना- रितेश मिश्रा (विश्वाश )