मजबूर हूँ इस लिए आज मैं मजदूर हूँ
आज इस दौर में हम 14 फरवरी के दिन Valentine Day के रूप में मानते है। और भी दिवस को बहुत उत्सह मानते है लेकिन क्या आप जानते है कि 1 मई को किस दिवस के रूप में मनाया जाता है शायद बहुत से लोगो को नहीं मालूम होगा मैं आप को बताने की चेष्टा करता हूँ। 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है क्या आपने कभी 1 मई को किसी एक मजदूर को एक फूल दिया है, नहीं दिया होगा।
हर वह व्यक्ति जो दिहाड़ी पर जीवन यापन करता है वह मजदूर की श्रेणी में आता है। मैं सबसे पहले आप सभी लोगो को समझाना चाहूँगा दिहाड़ी क्या है? दिहाड़ी का मतलब है "जब एक व्यक्ति कार्य पर जाता है तो उसके बदले उसे जो रूपए मिलते है। उन रूपये को उसकी एक दिन की दिहाड़ी कहते है।" दिहाड़ी में जितने दिन काम करोगे आप उतने दिन के रुपये मिलते है।
मजदूर या मजदूरी सुनकर कुछ लोगो को यह लगता है कि यह बहुत निचले स्तर का काम है। उनको हीन भावना से देखते है शायद वह भूल जाते है कि मजदूर न हो तो वह जिस घर में रहते है वह घर नहीं बन पाता। मजदूर अपना घर नहीं बना पता है लेकिन दुसरो के घर बनाता रहता है। हमारे आस पास की हर वस्तु से वह कही न कही वह जुड़ा रहता है। वह चाहे हमारे पैरों के नीचे की सड़क , शहरो में बड़ी-2 बिल्डिंग हो, गाँव से हमारे पास आने वाली खाने की वस्तुए, मजदूर के बिना मुमकिन नहीं।
मजदूर हमारे हर कामो से जुड़े होने पर भी, हमारा नजरिया उनके प्रति गलत है हम उनके प्रति सोचते नहीं है। जब हम मजदूर मंडी जाते है तो उनके भाव या दिहाड़ी सुनकर भौचके रह जाते है। लेकिन यह कभी नहीं सोचते है कि एक मजदूर साल में औसतन 200 से 250 दिन ही मजदूरी कर पता है बाकि 100 से 150 दिन वह मजदूरी नहीं कर पाता है इसमें सबसे बड़ा कारण है काम का न मिलना।
इस विषय पर मैंने कुछ मजदूरों से बात की मैंने उनसे यह पूछा साल में कितने दिन मजदूरी करते है मुन्ना ने जवाब दिया कि -बहुत ज्यादा 200 दिन, वही जफ़र ने कहा मैं आज एक माह बाद मंडी में आया हूँ तो मैंने पूछा क्यों तो जवाब आया कि मेरे काम करते समय सरिया मेरे पैर में लग गयी थी। ज्यादा चोट नहीं थी लेकिन भारी सामान नहीं उठा सकता था, एक दो दिन मैं मंडी आया लेकिन काम नहीं मिला फिर मैं गाँव वापस चला गया। मैंने पूछा काम क्यों नहीं मिला तो जवाब आया "लगडे घोड़े पर, पैसे कौन लगाता है" तो मैंने उनसे कहा गाँव है खेती क्यों नहीं करते है तो उन्होंने मुझे देखा और बोले बेटा अगर खेती से गुजारा हो जाता तो मैं यहाँ परिवार छोड़ कर क्यों आता।
ऐसे कई मजदूर से मिला बात की सबकी आपनी-2 कहानी, अपनी-2 मजबूरी है जो वह मजदूरी करते है। मेरा मकसद यह था बताना कि मजदूरों या मजदूरी शब्द को हीन भावना से न देखे क्योकि मजदूर नहीं होते तो हमारे बहुत से काम रुक जायेगे हमे घर की जगह खुले अस्मां में सोना पड़ेगा।
"मजबूर हूँ इसलिए आज मैं मजदूर हूँ,
तब भी मैं सकून मैं हूँ ,
शहर के हर घर की ईट में मैं मौजूद हूँ।"
